स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य और सामंतवाद-ब्राह्मणवाद दोनों के खिलाफ संघर्ष चला। भले ही अलग-अलग संगठनों-नायकों का जोर किसी पर कम या ज्यादा रहा हो, लेकिन हिंदू महासभा-आरएसएस जैसे संगठनों को छोड़ दिया जाए तो अन्य सभी शक्तियों के बीच इस मुद्दे पर सैद्धांतिक सहमति थी कि ब्रिटिश साम्राज्य का भारत से खात्मा होना चाहिए और देश के शासन-सत्ता की बागडोर जनता के हाथों में जाना चाहिए।
ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति का प्रश्न सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति तक सीमित नहीं था, इसमें यह तथ्य निहित और स्पष्ट था कि अब कोई अन्य देश या शक्ति एक देश के तौर पर भारत को नियंत्रित और संचालित नहीं करेगा। एक देश के रूप में भारत अपना निर्णय स्वतंत्र रूप में लेगा। इस निर्णय में किसी दूसरे देश या विदेशी शक्ति का हस्तक्षेप-दखल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। पारिभाषिक अर्थ में इसे राष्ट्रीय संप्रभुता कहा गया। ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति के बाद भारत एक संप्रभु राष्ट्र होगा।
इस राष्ट्रीय संप्रभुता से नाभिनालबद्ध जुड़ा हुआ निर्णय जनसंप्रभुता का था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सक्रिय सभी शक्तियां इस बात पर सहमत थीं कि भारत में संप्रभु शक्ति कोई ईश्वर, राजा-रानी, सम्राट-नवाब, कोई विशेष वर्ग-जाति, लिंग, भाषा-भाषी समूह या क्षेत्र विशेष के लोग नहीं होंगे। भारत की संप्रभुता भारत की जनता में निहित होगी।
भारत की जनता भारत के मामले में लिए जाने वाले निर्णयों के मामले में सर्व शक्तिमान होगी। इसको जन संप्रभुता के रूप में परिभाषित किया गया। इस जनसंप्रभुता को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के रूप में ठोस शक्ल दिया गया है। भारत की जनता अपनी जनसंप्रभुता को वोट के रूप में व्यवहार में लागू करती है। चूंकि भारत में कोई जनमत संग्रह नहीं होता, न ही किसी विशेष संवैधानिक संशोधन के लिए जनमत की अलग से राय ली जाती है, इसलिए यह जनसंप्रभुता चुनावों में भारतीय जनता व्यवहार में एसर्ट करती है या लागू करती है।
भारतीय संविधान सभा ने आम सहमति से राष्ट्रीय संप्रभुता और जनसंप्रभुता को स्वीकार किया। संविधान साफ शब्दों में राष्ट्रीय संप्रभुता और जनसंप्रभुता को स्वीकार करता है। संविधान की उद्देशिका में ही भारत को एक संप्रभु राष्ट्र घोषित किया गया है और जनता को सर्वशक्तिमान (संप्रभु) माना गया।
आजादी के बाद जितनी भी सरकारें सत्ता में आईं। सभी ने कमोबेश राष्ट्रीय संप्रभुता को बनाए रखा और उसे बनाए रखने की भरपूर कोशिश किया। भारत अमेरिकी नेतृत्व वाले या सोवियत खेमे वाली किसी गोलबंदी में शामिल न होकर एक राष्ट्र के तौर पर अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार बनाए रखा। गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सदस्य बना। भारत किसी सैन्य संगठन (जैसे नाटो) का सदस्य नहीं बना। भारत ने सारे दबावों के बाद परमाणु असप्रसार संधि (Nuclear Non-Proliferation Treaty (NPT) पर हस्ताक्षर नहीं किया। राष्ट्रीय हित के अनुसार परमाणु बम बनाना है या नहीं इसके बारे में निर्णय लेने की स्वतंत्रता बना रखा। बाद में इसी स्वतंत्रता का इस्तेमाल करके भारत ने 1995 में परमाणु बम बनाया। इसके बाद भारत ने बहुत सारे प्रतिबंधों का सामना किया।
1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध और बांग्लादेश के निर्माण के मामले में भी भारत ने अमेरिकी धमकी को दरकिनार कर दिया। उसके आगे झुका नहीं। स्वतंत्र देश के रूप में निर्णय लिया। बहुत सारे उतार -चढ़ावों और कमियों-कमजोरियों के बाद भी भारत अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता को बचाए और बनाए रखा, भले ही आर्थिक निर्भरता के चलते साम्राज्यवादी शोषण और लूट का शिकार बना रहा हो और बना हुआ है।
आज की तारीख में साफ-साफ दिख रहा है कि भारत आज़ादी के बाद राष्ट्रीय संप्रभुता के कमजोर पड़ने या खोने के मामले में सबसे बदतर हालात में पहुंच गया है। भारत का प्रधानमंत्री संसद में यह कह पाने की स्थिति में नहीं है कि हालिया भारत-पाकिस्तान के बीच के सैन्य संघर्ष (पहलगाम के बाद) को खत्म करने में अमेरिका या अमेरिकी राष्ट्रपति की कोई निर्णायक भूमिका नहीं है। वह यह नहीं कह पा रहा है कि भारत ने संप्रभु राष्ट्र के रूप में यह निर्णय स्वतंत्र रूप में लिया है। भारत का प्रधानमंत्री यह भी नहीं कर पा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप झूठ बोल रहे हैं कि उनके हस्तक्षेप या अमेरिकी प्रशासन के फोन काल से भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम हुआ है।
इसके पहले हम देख चुके हैं कि जब भारतीय नागरिकों के हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेड़ी डालकर जानवर की तरह अमेरिकी सैन्य विमान से भारत भेजा गया, तो भारत सरकार ने चूं तक नहीं किया। भारतीय नागरिकों के इस अपमान पर पूरी तरह चुप्पी साधे रही।
राष्ट्र संप्रभुता का एक बड़ा आयाम विदेश नीति से जुड़ा होता है। वर्तमान समय में स्थिति यह है कि भारत की विदेश नीति अमेरिका की बंधक बन गई है। अमेरिका निर्देश देता है कि भारत ईरान से क्या रिश्ता रखे या न रखे। भारत ईरान से तेल खरीदे या न खरीदे। भारत-फिलीस्तीन के मामले में क्या स्टैंड ले। जब अमेरिका और कुछ अन्य चंद देशों को छोड़कर सारी दुनिया इजराइल के खिलाफ फिलिस्तीनियों के कत्लेआम को रोकने के लिए निंदा प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र में पास करती है, भारत अमेरिकी दबाव में उसमें शामिल नहीं होता। वह तटस्थ रह जाता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर डोनाल्ड ट्रंप भारत को निर्देश देते हैं कि भारत रूस से तेल और हथियार न खरीदे, बल्कि अमेरिका से तेल और हथियार खरीदे। नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार यह साफ-साफ नहीं कह पा रही है कि भारत किससे हथियार खरीदेगा और किससे तेल खरीदेगा, यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता भारत की संप्रभुता से जुड़ा है। हम इस मामले में किसी के आगे नहीं झुकेंगे।
यह कहने की जगह भारत सरकार यह संकेत दे रही है कि वह रूस से तेल खरीदना कम कर रही है और अमेरिका से तेल खरीद बढ़ा रही है। नरेंद्र मोदी की सरकार अमेरिका को समझौते के टेबल पर यह कह रही है कि भारत अमेरिका से बड़े पैमाने पर भविष्य में हथियार खरीदेगा। हथियार किससे खरीदना, कितना खरीदना है और किन शर्तों पर खरीदना यह स्वतंत्रता भी भारत खो रहा है।
भारत ब्रिक्स का सदस्य है, इस पर भी अमेरिका को कड़ा ऐतराज है। वह धमकी दे रहा है कि ब्रिक्स देशों पर अमेरिका अतिरिक्त टैरिफ लगाएगा, जिसमें भारत सरकार भी शामिल है। भारत के बड़बोले प्रधानमंत्री के मुंह से यह आवाज भी नहीं निकल रही है कि भारत किस समूह का सदस्य बनेगा, यह निर्णय राष्ट्रीय हित के आधार पर लिया जाएगा। यह प्रश्न भारत के स्वतंत्र निर्णय लेने के सवाल से जुड़ा हुआ है। यह राष्ट्रीय संप्रभुता का मामला है।
भारत और अमेरिका के बीच चल रहे व्यापार समझौते में एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी है कि भारत चीन और अमेरिका के तथाकथित अन्य दुश्मन देशों के साथ क्या व्यापार करेगा या नहीं करेगा। इसमें निशाने पर चीन है। अमेरिका व्यापार समझौते में यह दबाव भी डाल रहा है कि भारत अपने डेयरी उद्योग और कृषि और किसानों की तबाही की कीमत पर भी इन मामलों में अमेरिका को भारत के बाजारों में मनमानी तरीके से प्रवेश की छूट दे। ऐसे कई सारे और मामले हैं।
जब नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री पद के दावेदार बन थे, तो उन्होंने सबसे अधिक भाषण भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने पर दिया था। एक ऐसा राष्ट्र जो किसी दूसरे देश के सामने झुके नहीं। प्रधानमंत्री बनने का बाद और आज तक वे भारत को दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बनाने का सब्जबाग दिखाते रहते हैं। इसी का एक हिस्सा है कि भारत 2047 तक विकसित देश बन जाएगा। लेकिन जो हुआ और हो रहा है, इसका उलटा। भारत एक के बाद एक मामले में अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता खोता जा रहा है, विशेषकर राष्ट्रीय संप्रभुता के एक बड़े आयाम विदेश नीति के मामले में।
हमारी विदेश नीति स्वतंत्र और संप्रभु देश की विदेश नीति की जगह एक दुमछल्ले देश की तरह हो गई है, जिसके हथियार खरीदने, तेल खरीदने, सामान खरीदने, किसी अंतराष्ट्रीय समूह या संगठन में शामिल होने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पक्ष तय करने में डोनाल्ड ट्रंप का मुंह ताकना पड़ रहा है।
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बाद के सारे घटनाक्रम यह बता रहे हैं कि भारत एक देश के रूप में स्वतंत्र निर्णय लेने और अपनी बात कहने की आजादी खो रहा है या करीब-करीब खो चुका है। बात-बात पर दहाड़ने वाले प्रधानमंत्री डोनाल्ड ट्रंप के सामने मिमियाती बिल्ली बन गए हैं। वे उतना भी साहस नहीं दिखा पा रहे हैं, जितना दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील या कोलंबिया आदि दिखा रहे हैं। चीन, रूस और ईरान की तो बात ही छोड़ दीजिए। डोनाल्ड ट्रंप के सामने नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का मिमियाना एक व्यक्ति का मिमियाना नहीं है, यह राष्ट्र का मिमियाना है। यह देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता का मिमियाना है। भारत की राष्ट्रीय संप्रभुता मिमिया रही है।
नरेंद्र मोदी ने 11 सालों में देश को वहां पहुंचा दिया है, जहां भारत एक स्वतंत्र और संप्रभु देश की जगह दुमछल्ले की तरह आत्मसमर्पण किया हुआ देश बन गया है। जिसे राजनीतिक भाषा में राहुल गांधी ने कहा कि नरेंदर मोदी सरेंडर मोदी बन गए हैं।
भारत स्वतंत्रता आंदोलन की एक सबसे बड़ी उपलब्धि राष्ट्रीय संप्रभुता नरेंद्र मोदी युग में करीब-करीब खो चुका है। यह क्यों, कैसे और किस हित में किया जा रहा है? इसका विश्लेषण फिर कभी।
जनसंप्रभुता स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव, स्वायत्त चुनाव आयोग, उसकी निष्पक्षता और एक संवैधानिक संस्था के तौर पर उसकी तटस्थता और सबसे बढ़कर हर वयस्क व्यक्ति के वोट देने के अधिकार की गारंटी से जुड़ा हुआ है। यह सारी चीजें नरेंद्र मोदी युग में खात्मे की ओर बढ़ रही हैं। इसके बारे में विस्तार से अगली कड़ी में।
(भारत जनसंप्रभुता कैसे खो रहा है, यह अगली कड़ी में।)
(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)